नया घर

19 अगस्त, 2010

हिन्दी से जुड़े विभिन्न आयामों पर हुई बातचीत -एक साक्षात्कार



संयुक्त राज्य अमेरिका में हिन्दी के एक प्रमुख कार्यकर्ता श्री राम चौधरी से हिन्दी से जुड़े विभिन्न आयामों पर हुई बातचीत के मुख्य अंश  
प्रश्न- हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। संविधान के अनुसार वह भारत की राजभाषा है। साहित्य की भाषा तो वह एक हजार वर्षों से है ही। क्या आप मानते हैं कि वह संयुक्त राष्ट्र की छ: मान्य भाषाओं की बिरादरी में शामिल होने वाली सातवीं भाषा बन सकेगी?
उत्तर- इस समय राष्ट्रसंघ की छ: आधिकारिक भाषाएं हैं- इंग्लिश, प्रेफन्च, रूसी, चीनी, स्पेनिश तथा अरबी। बीस अन्य भारतीय भाषाओं की भांति हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है। संविधान में हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात कही गई थी। परन्तु उसे अभी तक इस पद पर आसीन नहीं किया जा सका है। यह दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता है। यह आंतरिक दुर्बलता हिन्दी को राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के अभियान में बहुत बड़ी बाधा है। इस वक्तव्य में हिन्दी शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया गया है। हिन्दी एक क्षेत्रीय भाषा, हिन्दी एक राजभाषा तथा राष्ट्रसंघ की भाषा। हिन्दी को राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के प्रश्न पर हमें गम्भीर विचार करना होगा।
उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के संधिकाल में जब भारतीय स्वतंत्रता का प्रश्न उठाया गया था, तो अंग्रेजी सरकार का उत्तर था कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। राष्ट्र की अवधारणा में तीन तत्वों की उपस्थिति आवश्यक है, एक इतिहास, एक संस्कृति तथा एक भाषा। हजार वर्षों की राजनैतिक उथल-पुथल के बावजूद भारतीय संस्कृति अक्षुण्ण बनी रही, इस बीच में संस्कृत के स्थान पर हिन्दी भारतीय संस्कृति की वाहक तथा अखिल भारतीय संप्रेषण की भाषा बन गई। संस्कृत का ज्ञान विद्वत्वर्ग तक सीमित था, जबकि हिन्दी एक अखिल भारतीय जन भाषा थी। प्रत्येक मापदण्ड के अनुसार भारत में राष्ट्र के सभी गुण विद्यमान थे। महात्मा गांधी, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, बंकिम चन्द्र चटर्जी, महामना मदन मोहन मालवीय तथा राजगोपालाचार्य जैसे व्यक्ति हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। सन् 1920 में जब राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना हुई तो महात्मा गांधी का सुझाव था कि विद्यापीठ में शिक्षा का माध्यम हिन्दी हो। बीसवीं शताब्दी के अनेक प्रकाण्ड हिन्दी साहित्यकार स्वतंत्रता सेनानी भी थे। इन बातों से पूरे देश में हिन्दी के प्रति आदरभाव था।
आश्चर्य की बात नहीं कि भारतीय संविधान में हिन्दी को स्वतंत्र भारत की राजभाषा बनाये जाने का प्रावधान किया गया। हिन्दी को एक सक्षम प्रशासनिक भाषा के रूप में विकसित करने तथा सरकारी कर्मचारियों को हिन्दी में प्रशिक्षित करने के लिए संविधान में अधिकतम 15 वर्ष का समय दिया गया। अगले दस वर्षों में भाषागत राजनीति का प्रारम्भ हुआ। भाषा के आधार पर प्रान्तों का निर्माण हुआ तथा साठ के दशक में तमिलनाडु में हिन्दी का प्रबल विरोध हुआ। दुर्भाग्यवश, हिन्दी के राजभाषा बनने पर अनिश्चित काल के लिए रोक लगा दी गई। यदि एक राज्य भी हिन्दी को राजभाषा बनाने का विरोध करता है, तो हिन्दी को राजभाषा नहीं बनाने की घोषणा हुई। हिन्दी का विकास अवरुध्द हुआ और हिन्दी समर्थक हताश हुए।
इन परिस्थितियों में विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शृंखला प्रारम्भ की गई। पहला सम्मेलन सन् 1975 में नागपुर में आयोजित किया गया। सम्मेलन की पृष्ठभूमि में हिन्दी प्रेमियों का आक्रोश परिलक्षित था। संविधान में प्रावधान के बावजूद हिन्दी को राजभाषा नहीं बनाया गया था। उन्हें आशा थी कि राष्ट्रसंघ की भाषा बनने पर हिन्दी अनायास ही भारत की राजभाषा बन जायेगी। तब से लेकर सभी सम्मेलनों में हिन्दी को राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने के प्रस्ताव पारित किये गये हैं। लेकिन, तीस वर्षों तथा सात सम्मेलनों के बाद भी हम यथास्थिति में तेली के बैल की तरह चक्कर काट रहे हैं।
प्रश्न- वर्तमान परिवेश में जहां जातिवाद, प्रान्तवाद तथा आरक्षण का बोलबाला हो, व्यापक भ्रष्टाचार हो, सांस्कृतिक ऐक्य की अपील निष्फल होती जा रही हो, वहां जन साधारण तक आधुनिक ज्ञान पहुंचाने के लिए हिन्दी (तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं) के प्रयोग की अनिवार्यता, हिन्दी की परम सामर्थ्य बन सकती है। हमें हिन्दी को जनता तक आधुनिक ज्ञान-विज्ञान पहुंचाने वाली भाषा के रूप में प्रस्तुत करना होगा, तदर्थ उसे विकसित करना होगा। सौभाग्यवश, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी शब्दावली आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली भारत की सभी भाषाओं के लिए उपयोगी है। इस के प्रयोग से सभी भाषायें लाभान्वित होंगी, वे एक दूसरे के समीप आयेंगी। इस सामीप्य से हमें पुन: अपनी सामासिक संस्कृति का बोध होगा, हिन्दी का सांस्कृतिक महत्व पुन: उजागर होगा। हिन्दी विश्व के एक विशाल जनसमूह की भाषा है, उसे एक सम्पूर्ण भाषा के रूप में विकसित करना होगा। उसे राष्ट्रसंघ की भाषा बनने में समय लगेगा। जितनी जल्दी हम उसे आधुनिक ज्ञान की भाषा बनाएंगे, उतनी जल्दी वह भारत की राजभाषा तथा राष्ट्रसंघ की भाषा बन जायेगी।
यदि निकट भविष्य में आपको इसकी कोई संभावना दिखाई नहीं देती, तो उसके क्या कारण हैं?
उत्तर- यह बात सही है कि अन्य भारतीय भाषाओं में भी वे सभी दुर्बलतायें हैं, जो हिन्दी में व्याप्त हैं। परन्तु हमें याद रखना होगा कि हिन्दी की प्रतियोगिता क्षेत्रीय भाषाओं से नहीं विश्व भाषाओं से है। राष्ट्रसंघ की सभी भाषायें हिन्दी की तुलना में अधिक परिपुष्ट हैं। उदाहरणत: अमेरिका में चीनी भाषा 543 कालेजों में, अरबी 264कालेजों में, जबकि हिन्दी केवल 51 कालेजों में ही पढ़ाई जाती है।
प्रसन्नता का विषय है कि पिछले दो-तीन वर्षों से भारत सरकार ने भारत को राष्ट्रसंघ की सुरक्षा समिति का स्थायी सदस्य बनाने का अभियान प्रारम्भ किया है। वाजपेयी सरकार के विदेश राज्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सूरीनाम में सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (5-9 जून, 2003) के दौरान घोषणा की थी कि भारत सरकार संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनरल असेम्बली की सितम्बर 2003 की बैठक में हिन्दी को सातवीं आधिकारिक भाषा बनाए जाने का प्रस्ताव रखेगी। परन्तु कई कारणों से यह प्रस्ताव राष्ट्रसंघ में पेश नहीं किया गया। मनमोहन सिंह सरकार ने सुरक्षा समिति की स्थायी सदस्यता अभियान को तेज कर हिन्दी को राष्ट्र संघ की भाषा बनाने का आशय व्यक्त किया है। जैसा नीचे बताया जायेगा, राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए, जनरल असेम्बली के दो-तिहाई सदस्यों का अनुमोदन आवश्यक है।
जो भाषायें अभी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषायें हैं, वे किस आधार पर मान्य हुई थीं?
इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले राष्ट्रसंघ की उत्पत्ति का संक्षिप्त उल्लेख समीचीन होगा। सन् 1942 में जर्मनी के विरुध्द युध्दरत चार बड़े देश- अमेरिका, ब्रिटेन, रूस तथा चीन इस बात पर सहमत हुए कि विश्वयुध्दों को रोकने के लिए एक राष्ट्रसंघ के गठन की आवश्यकता है। उन्होंने निर्णय किया कि युध्द की समाप्ति पर वे इस पर काम करेंगे। जर्मनी की पराजय के पश्चात 25 अप्रैल सन् 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका के सैन प्रफान्सिस्को नगर में उपरोक्त देशों की बैठक में राष्ट्रसंघ के प्रारूप पर सहमति बनी। 26 जून 1945 में विश्व के 51 देशों ने उसे स्वीकार किया। 24 अक्टूबर सन् 1945 को राष्ट्रसंघ का प्राधिकार (चार्टर) लागू किया गया। इसके अनुसार अमेरिका, ब्रिटेन, प्रफांस, रूस तथा चीन को राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया गया। उन्हें निषेधाधिकार (वीटो अधिकार) दिया गया तथा पांच भाषाओं, इंग्लिश, फ्रेन्च, रूसी, चीनी, तथा स्पेनिश को राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाया गया। प्राधिकार में प्रावधान है कि राष्ट्रसंघ की जनरल असेम्बली के दो-तिहाई सदस्यों के अनुमोदन द्वारा किसी अन्य भाषा को भी राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाया जा सकता है। इसके अनुसार सन् 1971-72 के आसपास अरबी को राष्ट्रसंघ की छठी आधिकारिक भाषा बनाया गया। इस समय जनरल असेम्बली के 191 सदस्य हैं, अत: हिन्दी को राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए 128 देशों के अनुमोदन की आवश्यकता है।
प्रश्न- संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बन जाने से किसी भाषा को या उस भाषा के बोलने वालों को क्या लाभ होता है?
उत्तर- विश्व की सैकड़ों भाषाओं में अभी तक छह भाषओं को राष्ट्रसंघ की भाषा बनने का अवसर मिला है। किसी राष्ट्र की भाषा को यह अवसर मिलना गौरव की बात है, एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। राष्ट्रसंघ की भाषा बनने से वह अन्य आधिकारिक भाषाओं के सम्पर्क में आती है, परिष्कृत तथा समृध्द होती है, उसका सर्वांगीण विकास होता है। उसके द्वारा देश की संस्कृति का विस्तार किया जा सकता है।
प्रश्न- हिन्दी को राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने के लिए हमें (अर्थात हिन्दी भाषियों को, भारत सरकार को) क्या करना चाहिए?
उत्तर- वर्तमान भारत की कहानी दो नगरों की कहानी है। एक नगर के निवासी अंग्रेजी में दक्ष हैं। अंग्रेजी उनके लिए वरदान है, वे आधुनिक ज्ञान (विज्ञान, अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, प्रबंधन आदि) में नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं, उनके लिए विदेशों के द्वार खुले हैं। उनकी संख्या, भारत की जनसंख्या का लगभग पांच प्रतिशत है।
दूसरे नगर के लोगों में भारत की आबादी का विशाल वर्ग है। वहां लोग कुपोषित, अशिक्षित तथा कुंठित अवस्था में जी रहे हैं। अंग्रेजी उनकी समझ के बाहर है। वे हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषायें) जानते हैं। यह सोचना कि आधुनिक ज्ञान को उन तक अंग्रेजी द्वारा पहुंचाया जा सकेगा, एक क्रूर मजाक है। वास्तव में देशी भाषाओं के माध्यम से और साथ में टेलिविजन, रेडियो तथा रात्रि पाठशालाओं द्वारा उन तक आधुनिक ज्ञान पहुंचाया जा सकता है, उनकी उत्पादन क्षमता तथा कार्य कुशलता बढ़ाई जा सकती है, वे विश्व के श्रेष्ठ कारीगरों से टक्कर ले सकते हैं।
भारत के विकास में देशी भाषाओं की अनिवार्यता को हमें स्वीकारना होगा। हमें हिन्दी को सम्पूर्ण भाषा बनाना होगा। हमें यह भी स्वीकारना होगा कि हिन्दी को आधुनिक ज्ञान की भाषा बनाना, उसे राजभाषा बनाना तथा राष्ट्र संघ की एक आधिकारिक भाषा बनाना, एक अभियान के तीन सोपान हैं। इन सोपानों पर चढ़ने के लिए हमें विशिष्ट संघटकों का अनुमोदन तथा समर्थन प्राप्त करना होगा। वंचित वर्ग के सबलीकरण द्वारा भारत का विशाल वर्ग हिन्दी का प्रबल समर्थक बन जायेगा। हिन्दी का आधुनिकीकरण अन्य भारतीय भाषाओं के आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त करेगा।
आज देश की भौतिक अवसंरचना को सुदृढ़ बनाने की विशेष चर्चा है। इसके अन्तर्गत देश की नदियों को जोड़ने, महामार्गों द्वारा बडे नगरों को जोड़ने, गांवों को नगरों से जोड़ने, विद्युत संयत्रें को ग्रिडों से जोड़ने के कार्य आते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत कम्प्यूटरों द्वारा सूचना प्रसारण की योजनाओं के कार्यान्वन की बात हो रही है। भाषा को समस्त ज्ञान की अवसंरचना के रूप में देखा जाना चाहिए। इसे मूलभूत अवसंरचनाओं की पंक्ति में लाने की आवश्यकता है।
अभी तक हिन्दी को राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने का दायित्व हिन्दी साहित्यकारों के कन्धों पर रहा है। उनका तर्क है कि हिन्दी भारत की सांस्कृतिक भाषा है, भारत की सबसे अधिक समझी जाने वाली भाषा है, विदेशों में पढ़ाई जाने वाली भारतीय भाषाओं में प्रथम है, इसलिए उसे राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाना चाहिए। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि हिन्दी का परंपरागत साहित्य तो समृध्द है परन्तु, हिन्दी में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, सभी प्रकार की कारीगरी आदि विषयों में अच्छे साहित्य या अध्ययन सामग्री का अभाव है। जब तक हम हिन्दी को अच्छी रोजी-रोटी की भाषा नहीं बनाते, तब तक देश का युवा वर्ग उसकी ओर आकृष्ट नहीं होगा।
प्रश्न- हमें हिन्दी को राजनीति की मूल धारा में लाना होगा। चुनावों के दौरान कोई राजनैतिक दल, कोई समाजसेवी संस्था, वंचित वर्ग को कुशल कारीगर बनाने की बात नहीं करती। उन्हें कच्चे रोजगार दिलाने की बात होती है। इस प्रक्रिया में गरीबों के लिए आबंटित धन का सरलतापूर्वक दुरुपयोग किया जाता है। हमारे नीति निर्धारकों को इस बात का अहसास नहीं है कि कारीगरों की गुणवत्ता बढ़ाए बिना उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारना असंभव है। अभी तक हिन्दी की पूजा की गई है, उसे भारत माता की माथे की बिन्दी कहा गया है। हिन्दी को भारत की सांस्कृतिक भाषा बताया गया है। परन्तु हिन्दी को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की वाहक भाषा के रूप में नहीं प्रस्तुत किया गया। हिन्दी प्रेमियों को भारत सरकार पर निरंतर दबाव बनाकर हिंदी को राष्ट्रसंघ तथा विदेशों में ही नहीं, भारत में भी उचित स्थान दिलाना होगा। भारत के प्रबुध्द साहित्यकार, भारतवंशी विद्वान एवं जागरूक नागरिक हिन्दी के अवरोधों को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कुछ विचारक भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व को बढ़ते देखकर विभिन्न भारतीय
भाषाओं और हिन्दी के भविष्य को लेकर चिन्तित हैं। कुछ प्रदेशों में तो कम्प्यूटर का बहाना बनाकर पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाई जाने लगी है। आपकी इस संबंध में क्या मान्यता है?

उत्तर- उनकी चिंता उचित है, परन्तु कोरी चिंता से काम नहीं चलेगा। इसके लिए प्रयोजनमूलक चिंतन की आवश्यकता है, ताकि उसके आधार पर हम एक सुसंगठित अभियान चला सवेंफ। मैं अंग्रेजी का सम्मान करता हूं। भारत में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के लिए वह नितांत आवश्यक है। किंतु उसे शिक्षा का माध्यम बनाना भारत के हित में नहीं है। उसे पुस्तकालय की भाषा के रूप में विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाना चाहिए। प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी पढ़ाना हमारी दासवृत्ति का परिचायक है, हमारी हताशा का परिचायक है। हमें बैसाखी के बजाय मजबूत पैरों की जरूरत है। विश्व के अनेक छोटे देश- स्वीडन, डेनमार्क, नीदरलैन्ड, नौर्वे आदि प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक अपनी भाषाओं में पढ़ाई करते हैं। राष्ट्र के विकास में बड़ी कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। उन पर विजय पाकर ही राष्ट्र शक्तिशाली बनता है।
प्रश्न- कुछ विचारक यह मानने लगे हैं कि भाषा के बारे में सोचना या चर्चा करना अनावश्यक है। देश में एक भाषा राजभाषा हो चाहे अनेक, हिन्दी राजभाषा, संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बने चाहे न बने, इससे क्या फर्क पड़ता है? इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?
उत्तर- स्वतंत्रता प्राप्त होने से पूर्व भारत में ऐसे अनेक व्यक्ति थे, जो अंग्रेजी शासन के समर्थक थे। उन्हें अंग्रेजी शिक्षा का लाभ तथा ऊंचे पदों पर नियुक्ति मिली थी। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो योग्यता के आधार पर उन्हें उच्च पदों पर नियुक्त किया गया। आज भी भारत में अनेक ऐसे व्यक्ति हैं, जो अंग्रेजी में प्रवीण हैं, उच्च पदों पर विराजमान हैं, वे हिन्दी को अनावश्यक मानते हैं। हम उन्हें विद्या रत्न की उपाधि प्रदान कर सकते हैं, परन्तु भारत रत्न की उपाधि नहीं।
(पुरवाई-साहित्यिक पत्रिका से साभार)

7 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय आलेख है।

    वास्तव मे हिन्दी भाषा की दुर्दशा का कारण हमारे देश के कर्णधार ही हैं...जो अग्रेजी मोह के कारण इस पर ध्यान नही देते। यदि आजादी के बाद से ही योजना बना कर इस के प्रचार प्रसार की ओर ध्यान दिया जाता तो आज हिन्दी की हालत बेहतर होती।....वैसे अभी भी कुछ बिगड़ा नही है.....कोशिश कर के हिन्दी को सही स्थान दिलाया जा सकता है..

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  2. ब्‍लागजगत पर आपका स्‍वागत है ।

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  3. भाई राकेश कॊशिक,श्री परमजीत सिंह व आनन्द पाण्डेय जी,उत्साह-वर्धन के लिए धन्यवाद!आगे भी इसी तरह सहयोग बनायें रखें.

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  4. वैसे हम भारतीयों के अंग्रेजी के ज्ञान से ही विदेशों में अपने परचम लहराए हैं। फिर भी हिन्दी बोलने और लिखने हीनता का बोध छोड़ देने से ही हिन्दी का उद्धार संभव है।

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  5. अतुल जी!
    मेरा विरोध’अंग्रेजी’क्या, विश्व की किसी भी भाषा से नहीं हॆ.विरोध अंग्रेजी मानसिकता से हॆ.अपने देश की ही नहीं,विश्व की जितनी अधिक से अधिक भाषायें सीखी जा सकती हॆं,सीखनी चाहिए,इसमें कोई बुराई नहीं हॆ.बुराई हॆ तो उस भारतीय मानसिकता में,जो हिंदी अथवा किसी भारतीय भाषा बोलने वाले को हीन भाव से देखती हॆ ऒर अंग्रेजी या विदे्शी भाषा बोलने वाले के सामने नतमस्तक हो जाती हॆ.

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  6. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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