नया घर
23 सितंबर, 2010
हिन्दी पखवाडा-विनोद पाराशर
साहब ने-
चपरासी को
हिन्दी में फटकारा
’हिन्दी-स्टॆनों’ को
पुचकारा
ऒर-कलर्क को
अंग्रेजी टिप्पणी के लिए
लताडा.
क्या करें ?
मजबूरी हॆ-
वो आजकल मना रहे हॆं
हिंदी पखवाडा.
=============
14 सितंबर, 2010
हिंदी दिवस:कुछ जरुरी सवाल(?)
सन् 1949 में, 14 सितम्बर को भारत के संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। तब से प्रत्येक वर्ष,केन्द्र सरकार के सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी दिवस मनाया जाता हॆ. आज आप भी मना रहे हॆं.किसी किसी कार्यालय में तो ’हिंदी दिवस’उस कार्यालय की ’हिंदी’वाली फाईल में ही मन जाता हॆ.साथ वाले कर्मचारी तक को भी पता नहीं लग पाता कि आज ’हिंदी-दिवस’ हॆ.यदि कोई कार्यालय ज्यादा ही सक्रिय हुआ तो थोडी देर के लिए सभी कर्मचारियों को एकत्रित किया,रुखे से मन से, मंत्री महोदय अथवा विभागाध्यक्ष की, हिंदी में काम करने की अपील पढी,आगे से कर्मचारियों को हिंदी में काम करने की शपथ दिलवाई-बस! मन गया हिंदी दिवस.हर साल हिंदी में काम करने की कसम खाते हॆं ऒर उसी दिन तोड भी देते हॆं.यही सिलसिला पिछले 60 साल से लगातार चल रहा हॆ.शायद आगे भी चलेगा.
क्या हमने कभी इस विषय में गंभीरता से सोचा हॆ कि –भारत सरकार की राज-भाषा नीति के अनुसार- अपना सरकारी काम-काज’हिंदी’ में ही क्यों करना चाहिए ? अंग्रेजी में क्यों नही? हिंदी में करो या अंगेजी में क्या फर्क पडता हॆ? ऎसे बहुत से सवाल हॆ जो अक्सर पूछे जाते हॆं.लेकिन इन सवालों पर कभी गंभीरता से चर्चा नहीं की जाती हॆ.हिंदी-दिवस एक ऎसा अवसर हॆ,जब इन मुद्दों पर खुले मन से,चर्चा की जानी चाहिए.
पहला सवाल-सरकारी कर्मचारियों को अपना सरकारी काम-काज हिंदी में क्यों करना चाहिए?
हमारे देश भारत में,तानाशाही नहीं,लोकतात्रिक शासन व्यवस्था हॆ.देश का शासन जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता हॆ.सरकारी काम करने व करवाने के क्या नियम, होंगें-इसका निर्धारण करना-हम सरकारी कर्मियों का काम नहीं,उन जन-प्रतिनिधियों का हॆ,जिन्हें जनता ने चुनकर भेजा हॆ.सरकारी कर्मचारी हमें किसी ने जबर्दस्ती नहीं बनाया.हमने यह सरकारी नॊकरी स्वयं स्वीकार की हॆ.नियुक्ति के समय हम सभी ने शपथ ली हॆ कि सरकार द्वारा समय-समय पर बनाये गये नियमों का पालन करेंगें.सरकार हमसे जो काम करवाती हॆ-उसके बदले हमें वेतन देती हॆ-जिससे हमारे परिवार का गुजारा चलता हॆ.हम एक अच्छा सभ्य जीवन जीते हॆं.’हिंदी’को राजभाषा का सॆविधानिक दर्जा मिले-60 वर्ष बीत चुके हॆं.लेकिन सरकारी काम-काज में,अभी तक हमने इसे कितना अपनाया हॆ? यह बात किसी से छिपी नहीं हॆ.जिस अंग्रेजी को सहयोगी भाषा के रुप में,कुछ वर्षों के लिए अपनाने की छूट दी गयी थी-वही वास्तव में राजभाषा के सिहासन पर जमी बॆठी हॆ.राजभाषा’हिंदी’ को लागू करने के संबंध में सरकार की नीति अभी तक सहयोग व प्रोत्साहन की रही हॆ.कोई जोर-जबर्दस्ती का रवॆया अभी तक नहीं अपनाया हॆ.शायद सरकार की इसी नीति का फायदा उठाकर,कुछ अंग्रेजीपरस्त अधिकारी ऒर कर्मचारी ’हिंदी’में काम करने का प्रयास ही नहीं करते-जबकि सरकार की तरफ से हर प्रकार का सहयोग उन्हें दिया जा रहा हॆ.रामचरित्र मानस में तुलसीदासजी ने लिखा हॆ-’भय बिन होय न प्रीति’अर्थात भय दिखाये बिना तो प्रेम भी नहीं होता.क्या हम उसी दिन का इंतजार कर रहे हॆं-जब सरकार राजभाषा नियमों की अवहेलना करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान करेगी?क्या हमारा यह नॆतिक दायित्व नहीं बनता कि जनता का काम,उस जनता की भाषा में करें-जिसे देश की 90% से अधिक आबादी आसानी से समझती हॆ?थोडी सी अपनी कार्य करने की सुविधा ऒर एक विदेशी भाषा के प्रति अनावश्यक मोह के लिए-लोकतांत्रिक व्यवस्था में-अधिकांश जनता को,उसके अधिकारों से वंचित कर देना-कहां तक उचित हॆ? जरा सोचकर तो देखिये.
दूसरा सवाल:सरकारी काम-काज अंग्रेजी में ही क्यों नहीं?
अंग्रेजी ही नहीं,विश्व की कोई भी भाषा बुरी नहीं हॆ.भाषा तो विचारों को एक-दूसरे तक प्रेषित करने का माध्यम मात्र हॆ.अपनी जानकारी बढाने के लिए,सामर्थ्य के अनुसार-हमें भारतीय ही नहीं,विश्व की ज्यादा से ज्यादा भाषा सीखनी चाहिए.इसमें कोई दो राय नहीं कि अंग्रेजी ने अपनी कर्मठता के बल पर,विश्व में अपना परचम लहराया हॆ.लेकिन स्वतंत्रता के 63 साल बाद भी,एक विदेशी भाषा का राजभाषा के रुप में कब्जा जमाये रखना-किसी भी नजरिये से उचित नहीं ठहराया जा सकता.सारे कानूनी प्रावधान होते हुए-कुछ लोगों की जिद्द के कारण ,बडी आबादी को उनके अधिकारों से वंचित रखना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं हॆ.सभी भारतीय भाषाओं के मध्य अंग्रेजी दीवर बनकर खडी हुई हॆ,वह हम भारतीयों को अपनी भाषा में संवाद करने ही नहीं देती.अंग्रेजी को विदेशों से सम्पर्क भाषा के रुप में मान्यता दी जा सकती हॆ,लेकिन हम भारतीयों के आपसी संवाद के लिए कोई स्वदेशी भाषा ही होनी चाहिए.इसके लिए हिंदी के अलावा ऒर कॊन-सी सर्व-सुलभ भारतीय भाषा हॆ जिसे राजभाषा का दर्जा दिया जा सके?
इसके अलावा भी-बहुत से सवाल हॆं जॆसे-सभी सरकारी कामों में हिंदी सबसे निचले पायदान पर क्यों हॆ?क्या कार्यालय में राजभाषा हिंदी में काम करना,सरकारी काम नहीं हॆ?......य़दि आप, हिंदी दिवस के अवसर पर,बिना किसी पूर्वा-ग्रह के,इन सवालों पर विचार-मंथन के लिए तॆयार हॆं,तो मेरी शुभकामनायें आपके साथ हॆं.
जय हिंद!
क्या हमने कभी इस विषय में गंभीरता से सोचा हॆ कि –भारत सरकार की राज-भाषा नीति के अनुसार- अपना सरकारी काम-काज’हिंदी’ में ही क्यों करना चाहिए ? अंग्रेजी में क्यों नही? हिंदी में करो या अंगेजी में क्या फर्क पडता हॆ? ऎसे बहुत से सवाल हॆ जो अक्सर पूछे जाते हॆं.लेकिन इन सवालों पर कभी गंभीरता से चर्चा नहीं की जाती हॆ.हिंदी-दिवस एक ऎसा अवसर हॆ,जब इन मुद्दों पर खुले मन से,चर्चा की जानी चाहिए.
पहला सवाल-सरकारी कर्मचारियों को अपना सरकारी काम-काज हिंदी में क्यों करना चाहिए?
हमारे देश भारत में,तानाशाही नहीं,लोकतात्रिक शासन व्यवस्था हॆ.देश का शासन जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता हॆ.सरकारी काम करने व करवाने के क्या नियम, होंगें-इसका निर्धारण करना-हम सरकारी कर्मियों का काम नहीं,उन जन-प्रतिनिधियों का हॆ,जिन्हें जनता ने चुनकर भेजा हॆ.सरकारी कर्मचारी हमें किसी ने जबर्दस्ती नहीं बनाया.हमने यह सरकारी नॊकरी स्वयं स्वीकार की हॆ.नियुक्ति के समय हम सभी ने शपथ ली हॆ कि सरकार द्वारा समय-समय पर बनाये गये नियमों का पालन करेंगें.सरकार हमसे जो काम करवाती हॆ-उसके बदले हमें वेतन देती हॆ-जिससे हमारे परिवार का गुजारा चलता हॆ.हम एक अच्छा सभ्य जीवन जीते हॆं.’हिंदी’को राजभाषा का सॆविधानिक दर्जा मिले-60 वर्ष बीत चुके हॆं.लेकिन सरकारी काम-काज में,अभी तक हमने इसे कितना अपनाया हॆ? यह बात किसी से छिपी नहीं हॆ.जिस अंग्रेजी को सहयोगी भाषा के रुप में,कुछ वर्षों के लिए अपनाने की छूट दी गयी थी-वही वास्तव में राजभाषा के सिहासन पर जमी बॆठी हॆ.राजभाषा’हिंदी’ को लागू करने के संबंध में सरकार की नीति अभी तक सहयोग व प्रोत्साहन की रही हॆ.कोई जोर-जबर्दस्ती का रवॆया अभी तक नहीं अपनाया हॆ.शायद सरकार की इसी नीति का फायदा उठाकर,कुछ अंग्रेजीपरस्त अधिकारी ऒर कर्मचारी ’हिंदी’में काम करने का प्रयास ही नहीं करते-जबकि सरकार की तरफ से हर प्रकार का सहयोग उन्हें दिया जा रहा हॆ.रामचरित्र मानस में तुलसीदासजी ने लिखा हॆ-’भय बिन होय न प्रीति’अर्थात भय दिखाये बिना तो प्रेम भी नहीं होता.क्या हम उसी दिन का इंतजार कर रहे हॆं-जब सरकार राजभाषा नियमों की अवहेलना करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान करेगी?क्या हमारा यह नॆतिक दायित्व नहीं बनता कि जनता का काम,उस जनता की भाषा में करें-जिसे देश की 90% से अधिक आबादी आसानी से समझती हॆ?थोडी सी अपनी कार्य करने की सुविधा ऒर एक विदेशी भाषा के प्रति अनावश्यक मोह के लिए-लोकतांत्रिक व्यवस्था में-अधिकांश जनता को,उसके अधिकारों से वंचित कर देना-कहां तक उचित हॆ? जरा सोचकर तो देखिये.
दूसरा सवाल:सरकारी काम-काज अंग्रेजी में ही क्यों नहीं?
अंग्रेजी ही नहीं,विश्व की कोई भी भाषा बुरी नहीं हॆ.भाषा तो विचारों को एक-दूसरे तक प्रेषित करने का माध्यम मात्र हॆ.अपनी जानकारी बढाने के लिए,सामर्थ्य के अनुसार-हमें भारतीय ही नहीं,विश्व की ज्यादा से ज्यादा भाषा सीखनी चाहिए.इसमें कोई दो राय नहीं कि अंग्रेजी ने अपनी कर्मठता के बल पर,विश्व में अपना परचम लहराया हॆ.लेकिन स्वतंत्रता के 63 साल बाद भी,एक विदेशी भाषा का राजभाषा के रुप में कब्जा जमाये रखना-किसी भी नजरिये से उचित नहीं ठहराया जा सकता.सारे कानूनी प्रावधान होते हुए-कुछ लोगों की जिद्द के कारण ,बडी आबादी को उनके अधिकारों से वंचित रखना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं हॆ.सभी भारतीय भाषाओं के मध्य अंग्रेजी दीवर बनकर खडी हुई हॆ,वह हम भारतीयों को अपनी भाषा में संवाद करने ही नहीं देती.अंग्रेजी को विदेशों से सम्पर्क भाषा के रुप में मान्यता दी जा सकती हॆ,लेकिन हम भारतीयों के आपसी संवाद के लिए कोई स्वदेशी भाषा ही होनी चाहिए.इसके लिए हिंदी के अलावा ऒर कॊन-सी सर्व-सुलभ भारतीय भाषा हॆ जिसे राजभाषा का दर्जा दिया जा सके?
इसके अलावा भी-बहुत से सवाल हॆं जॆसे-सभी सरकारी कामों में हिंदी सबसे निचले पायदान पर क्यों हॆ?क्या कार्यालय में राजभाषा हिंदी में काम करना,सरकारी काम नहीं हॆ?......य़दि आप, हिंदी दिवस के अवसर पर,बिना किसी पूर्वा-ग्रह के,इन सवालों पर विचार-मंथन के लिए तॆयार हॆं,तो मेरी शुभकामनायें आपके साथ हॆं.
जय हिंद!
12 सितंबर, 2010
हिंदी एक पुष्प
उत्तरप्रदेश के भोजीपुरा में जन्में तथा इस समय हॆदराबाद में एक सरकारी विभाग में सेवारत श्री सुनील कुमार की राजभाषा हिंदी को सपर्पित- पढिये यह कविता-
हिंदी एक पुष्प-श्री सुनील कुमार
रंग बिरंगे फूल खिले है
भाषा के इस उपवन में |
सबकी अपनी सुगंध बसी है
हर मानस के मन में |
मग़र इस उपवन की शोभा को
बस एक ही पुष्प बढ़ाता
नाम पड़ा है हिंदी जिसका
और जो सबको महकाता |
अपने रस की कुछ बूंदों को
जब इसने कविता में डाला
अमर हो गए कवि देश के
पन्त प्रसाद और निराला |
जिसके मन में बसी यह भाषा
या जो इसको अपनाता |
नहीं ज़रूरत किसी प्रमाण की
वह सच्चा देश भक्त कहलाता |
हिंदी एक पुष्प-श्री सुनील कुमार
रंग बिरंगे फूल खिले है
भाषा के इस उपवन में |
सबकी अपनी सुगंध बसी है
हर मानस के मन में |
मग़र इस उपवन की शोभा को
बस एक ही पुष्प बढ़ाता
नाम पड़ा है हिंदी जिसका
और जो सबको महकाता |
अपने रस की कुछ बूंदों को
जब इसने कविता में डाला
अमर हो गए कवि देश के
पन्त प्रसाद और निराला |
जिसके मन में बसी यह भाषा
या जो इसको अपनाता |
नहीं ज़रूरत किसी प्रमाण की
वह सच्चा देश भक्त कहलाता |
11 सितंबर, 2010
हिंदी पर बैठक, अंग्रेजी में लिखा-पढी
हिंदी पर बैठक, अंग्रेजी में लिखा-पढी
अमर उजाला-दॆनिक के आज दिनांक 11-09-2010 के अंक में राजभाषा हिंदी के संबंध में एक रिपोर्ट छ्पी हॆ.जरा आप भी देखिये हिंदी को लेकर कितने संवेदनशील हॆं अपने नेता ऒर अधिकारी.
जहां हिंदी की अस्मिता के सवाल पर विमर्श होना था, वहां अंग्रेजीदां अफसरों ने इसे अपमानित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। वाकया हिंदी पखवारे के दौरान राजभाषा समिति की बैठक का है। लोक कार्मिक और पेंशन मंत्रालय ने हिंदी के बजाए अंग्रेजी में दस्तावेज उपलब्ध कराए। इससे बैठक में मौजूद सांसद बेहद नाराज हुए। एक सांसद तो इतना भड़क गए कि उन्होंने दस्तावेज के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।अफसरों की हरकत से अपमानित हुई राजभाषा गृहमंत्री पी चिदंबरम की अध्यक्षता वाली संसदीय राजभाषा समिति की पिछले तीन दिन से बैठक चल रही थी। बुधवार की बैठक में 35 से अधिक सांसद मौजूद थे। समिति के सदस्य प्रभात ने बताया कि लोक कार्मिक और पेंशन मंत्रालय के अधिकारी ने दस्तावेज अंग्रेजी में हाथ से लिखकर मुहैया कराए। सदस्यों के आपत्ति करने पर हिंदी में दस्तावेज मुहैया कराने में असमर्थता जताई। जब सदस्यों ने याद दिलाया कि राजभाषा अधिनियम की धारा 3 (3) के तहत हिंदी में दस्तावेज होना जरूरी है तो अधिकारी ने जवाब दिया कि उनके मंत्रालय के पास हिंदी अनुवादकों की कमी है और वह इसे हिंदी में उपलब्ध नहीं करा सकते हैं।सांसदों ने जताई नाराजगी, फाड़ दिए दस्तावेज इसका भाजपा सांसदों ने कड़ा विरोध किया। नाराज भाजपा सांसद रमेश वैश्य ने दस्तावेज फाड़ दिए। भाजपा के तीनों सांसद रमेश वैश्य, प्रभात और अशोक अर्गल बैठक से खफा होकर उठकर चले गए। पी चिदंबरम की गैरमौजूदगी के कारण बैठक की अध्यक्षता उपाध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी कर रहे थे। इस बारे में समिति के उपाध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी ने बताया कि संसदीय समिति की बैठक गोपनीय होती है।अफसरों का रवैया अत्यंत आपत्तिजनक जब तक रिपोर्ट सदन के पटल पर न रखी जाए तब किसी को इस बारे में टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं होता है। इसलिए इस बारे में वह इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकेंगे। वरिष्ठ कवि और समीक्षक अशोक वाजपेयी ने कहा कि बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है हिंदी न तो कभी राजभाषा हो पाई है और न ही कभी होने वाली है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक वेद प्रताप वैदिक ने कहा कि हिंदी के प्रति सरकार के अफसरों का रवैया अत्यंत आपत्तिजनक है।हिंदी का सबसे अधिक अहित विभिन्न विभागों में बैठे राजभाषा अधिकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत हिंदी अधिकारी करते हैं। - अशोक वाजपेयी, वरिष्ठ कवि और समीक्षक
अमर उजाला-दॆनिक के आज दिनांक 11-09-2010 के अंक में राजभाषा हिंदी के संबंध में एक रिपोर्ट छ्पी हॆ.जरा आप भी देखिये हिंदी को लेकर कितने संवेदनशील हॆं अपने नेता ऒर अधिकारी.
जहां हिंदी की अस्मिता के सवाल पर विमर्श होना था, वहां अंग्रेजीदां अफसरों ने इसे अपमानित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। वाकया हिंदी पखवारे के दौरान राजभाषा समिति की बैठक का है। लोक कार्मिक और पेंशन मंत्रालय ने हिंदी के बजाए अंग्रेजी में दस्तावेज उपलब्ध कराए। इससे बैठक में मौजूद सांसद बेहद नाराज हुए। एक सांसद तो इतना भड़क गए कि उन्होंने दस्तावेज के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।अफसरों की हरकत से अपमानित हुई राजभाषा गृहमंत्री पी चिदंबरम की अध्यक्षता वाली संसदीय राजभाषा समिति की पिछले तीन दिन से बैठक चल रही थी। बुधवार की बैठक में 35 से अधिक सांसद मौजूद थे। समिति के सदस्य प्रभात ने बताया कि लोक कार्मिक और पेंशन मंत्रालय के अधिकारी ने दस्तावेज अंग्रेजी में हाथ से लिखकर मुहैया कराए। सदस्यों के आपत्ति करने पर हिंदी में दस्तावेज मुहैया कराने में असमर्थता जताई। जब सदस्यों ने याद दिलाया कि राजभाषा अधिनियम की धारा 3 (3) के तहत हिंदी में दस्तावेज होना जरूरी है तो अधिकारी ने जवाब दिया कि उनके मंत्रालय के पास हिंदी अनुवादकों की कमी है और वह इसे हिंदी में उपलब्ध नहीं करा सकते हैं।सांसदों ने जताई नाराजगी, फाड़ दिए दस्तावेज इसका भाजपा सांसदों ने कड़ा विरोध किया। नाराज भाजपा सांसद रमेश वैश्य ने दस्तावेज फाड़ दिए। भाजपा के तीनों सांसद रमेश वैश्य, प्रभात और अशोक अर्गल बैठक से खफा होकर उठकर चले गए। पी चिदंबरम की गैरमौजूदगी के कारण बैठक की अध्यक्षता उपाध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी कर रहे थे। इस बारे में समिति के उपाध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी ने बताया कि संसदीय समिति की बैठक गोपनीय होती है।अफसरों का रवैया अत्यंत आपत्तिजनक जब तक रिपोर्ट सदन के पटल पर न रखी जाए तब किसी को इस बारे में टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं होता है। इसलिए इस बारे में वह इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकेंगे। वरिष्ठ कवि और समीक्षक अशोक वाजपेयी ने कहा कि बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है हिंदी न तो कभी राजभाषा हो पाई है और न ही कभी होने वाली है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक वेद प्रताप वैदिक ने कहा कि हिंदी के प्रति सरकार के अफसरों का रवैया अत्यंत आपत्तिजनक है।हिंदी का सबसे अधिक अहित विभिन्न विभागों में बैठे राजभाषा अधिकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत हिंदी अधिकारी करते हैं। - अशोक वाजपेयी, वरिष्ठ कवि और समीक्षक
05 सितंबर, 2010
राजमाता ’हिन्दी’ की सवारी -विनोद पाराशर
होशियार ! खबरदार !!
आ रहे हॆं
राजमाता ’हिन्दी’ के शुभचिंतक
मॆडम ’अंग्रेजी’ के पहरेदार !
हर वर्ष की भांति
इस बार भी
ठीक 14 सितंबर को
राजमाता हिन्दी की सवारी
धूम-धाम से निकाली जायेगी
कुछ अंग्रेज-भक्त अफसरों की टोली
’हिन्दी-राग’ गायेगी।
दरबारियों से हॆ अनुरोध
उस दिन ’सेंडविच’ या ’हाट-डाग’
राजदरबार में लेकर न आयें।
’खीर-पकवान’ या ’रस-मलाई’ जॆसी
भारत स्वीट-डिश ही खायें।
आम जनता
खबरदार !
वॆसे तो हमने
चप्पे-चप्पे पर
बॆठा रखे हॆं-पहरेदार ।
फिर भी-
हो सकता हॆ
कोई सिरफिरा
उस दिन
अपने आप को
’हिन्दी-भक्त’ बताये
हमारे निस्वार्थ ’हिन्दी-प्रेम’ को
छल-प्रपंच या ढकोसला बताये।
कृपया-
ऎसी अनावश्यक बातों पर
अपने कान न लगायें
भूखे आयें
नंगे आयें
आखों वाले अंधे आयें
राजमाता ’हिन्दी’ का
गुणगान गायें।
***********
आ रहे हॆं
राजमाता ’हिन्दी’ के शुभचिंतक
मॆडम ’अंग्रेजी’ के पहरेदार !
हर वर्ष की भांति
इस बार भी
ठीक 14 सितंबर को
राजमाता हिन्दी की सवारी
धूम-धाम से निकाली जायेगी
कुछ अंग्रेज-भक्त अफसरों की टोली
’हिन्दी-राग’ गायेगी।
दरबारियों से हॆ अनुरोध
उस दिन ’सेंडविच’ या ’हाट-डाग’
राजदरबार में लेकर न आयें।
’खीर-पकवान’ या ’रस-मलाई’ जॆसी
भारत स्वीट-डिश ही खायें।
आम जनता
खबरदार !
वॆसे तो हमने
चप्पे-चप्पे पर
बॆठा रखे हॆं-पहरेदार ।
फिर भी-
हो सकता हॆ
कोई सिरफिरा
उस दिन
अपने आप को
’हिन्दी-भक्त’ बताये
हमारे निस्वार्थ ’हिन्दी-प्रेम’ को
छल-प्रपंच या ढकोसला बताये।
कृपया-
ऎसी अनावश्यक बातों पर
अपने कान न लगायें
भूखे आयें
नंगे आयें
आखों वाले अंधे आयें
राजमाता ’हिन्दी’ का
गुणगान गायें।
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02 सितंबर, 2010
लो! शुरु हो गयी’हिंदी’की नॊटंकी
हमारा देश त्यॊहारों का देश हॆ.हर महिने कोई न कोई त्यॊहार आ ही जाता हॆ.वॆसे तो हम सभी त्यॊहार बडी श्रृद्धा ऒर उल्लास से मनाते हॆं,लेकिन जिस त्यॊहार का जिक्र मॆं करने जा रहा हूं,उसमें श्रृद्धा ऒर उल्लास को छोडकर-बाकी सब-कुछ होता हॆ.यह एक सरकारी त्यॊहार हॆ जो केन्द्र सरकार के सभी कार्यालयों में,प्रत्येक वर्ष 14 सिंतंबर को मनाया जाता हॆ.जी हां!आप ठीक समझे,मॆं ’हिंदी-दिवस’की ही बात कर रहा हूं.
सरकारी त्यॊहार हॆ,तो मनेगा भी-सरकारी ही तरीके से.केन्द्र सरकार का राजभाषा विभाग ,प्रत्येक वर्ष के अगस्त महीने में ही इसकी रुप-रेखा तॆयार कर लेता हॆ.सभी कार्यालयों को,उनके विभाग के माध्यम से निर्देश भिजवा दिये जाते हॆं कि इस त्यॊहार को उन्हें कॆसे मनाना हॆ? परम्परा यह हॆ कि इस त्यॊहार को ’हिंदी-सप्ताह’ अथवा ’हिंदी-पखवाडे’के रुप में मनाया जाता हॆ.सभी सरकारी कार्यालयों के बाहर सप्ताह अथवा पखवाडे के लिए-एक बॆनर टांग दिया जाता हॆ .जिसपर बडे-बडे अक्षरों में-’हिंदी-सप्ताह’ या ’हिंदी-पखवाडा’ दिनांक ...............से ........... .... तक-लिखा होता हॆ.बॆनर पर कार्यालय का नाम ऒर किसी नेता अथवा कवि या लेखक की, हिंदी के संबंध में कही गयी, कोई उक्ति अथवा पंक्ति भी लिखी होती हॆ.इस बॆनर को हर साल बनवाने की जरुरत नहीं पडती,सिर्फ वर्ष ऒर तिथि की जगह पर एक नयी चेपी लगाने से ही,कई साल तक काम चल जाता हॆ.कार्यालय के बाहर टंगा यह बॆनर,बाहर वालों को ऎसा अहसास देता हॆ,जॆसे अंदर कुछ खास हो रहा हॆ,जबकि अंदर कुछ भी खास नहीं होता.सब कुछ पहले जॆसा ही चलता रहता हॆ.
कोई एक दिन ’हिन्दी-प्रतियोगिता’ के नाम पर, कर्मचारियों के मनोरंजन के लिए निश्चित कर लिया जाता हॆ.प्रतियोगिता वाले दिन,अंधों में काणे राजा-यानि हिंदी में कुछ पढने-लिखने वाले कर्मचारियों को,नगद-पुरस्कार का लालच देकर,जबर्दस्ती हिंदी निबंध-लेखन व भाषण-प्रतियोगिता में बॆठाया जाता हॆ.कई बार तो पुरस्कार ज्यादा ऒर प्रतियोगी कम रह जाते हॆं.प्रतियोगिता खत्म होने के बाद,पुरस्कार-वितरण समारोह.कार्यालय अध्यक्ष अथवा कोई हिंदी-अधिकारी,मुस्कराने की कॊशिश करते हुए,पुरस्कार विजेताओं को नगद-पुरस्कार प्रदान करता हॆ.यदि विभाग की कोई पत्रिका हॆ तो उसके लिए फोटों भी तॆयार.कुछ कर्मचारी यह सोचकर,ताली बजाते हॆं कि पुरस्कार-विजेता को मिली राशी से, पार्टी के नाम पर, कुछ न कुछ तो वसूल कर ही लेंगें.समारोह के अंत में,अध्यक्ष महोदय-कर्मचारियों को हिंदी में काम करने का उपदेश देते हॆं.उसके बाद कुछ हल्का जल-पान ऒर फिर खेल खत्म! अगले दिन से फिर उसी पुराने ढर्रे पर.आजादी के इतने साल बाद भी-हर साल,वही नॊटंकी!क्या कभी वह दिन भी आयेगा,जब हम इस अंग्रेजी मानसिकता को उतार कर,आपस में अपनी ही भाषा में संवाद कर सकेगें?
***********************
सरकारी त्यॊहार हॆ,तो मनेगा भी-सरकारी ही तरीके से.केन्द्र सरकार का राजभाषा विभाग ,प्रत्येक वर्ष के अगस्त महीने में ही इसकी रुप-रेखा तॆयार कर लेता हॆ.सभी कार्यालयों को,उनके विभाग के माध्यम से निर्देश भिजवा दिये जाते हॆं कि इस त्यॊहार को उन्हें कॆसे मनाना हॆ? परम्परा यह हॆ कि इस त्यॊहार को ’हिंदी-सप्ताह’ अथवा ’हिंदी-पखवाडे’के रुप में मनाया जाता हॆ.सभी सरकारी कार्यालयों के बाहर सप्ताह अथवा पखवाडे के लिए-एक बॆनर टांग दिया जाता हॆ .जिसपर बडे-बडे अक्षरों में-’हिंदी-सप्ताह’ या ’हिंदी-पखवाडा’ दिनांक ...............से ........... .... तक-लिखा होता हॆ.बॆनर पर कार्यालय का नाम ऒर किसी नेता अथवा कवि या लेखक की, हिंदी के संबंध में कही गयी, कोई उक्ति अथवा पंक्ति भी लिखी होती हॆ.इस बॆनर को हर साल बनवाने की जरुरत नहीं पडती,सिर्फ वर्ष ऒर तिथि की जगह पर एक नयी चेपी लगाने से ही,कई साल तक काम चल जाता हॆ.कार्यालय के बाहर टंगा यह बॆनर,बाहर वालों को ऎसा अहसास देता हॆ,जॆसे अंदर कुछ खास हो रहा हॆ,जबकि अंदर कुछ भी खास नहीं होता.सब कुछ पहले जॆसा ही चलता रहता हॆ.
कोई एक दिन ’हिन्दी-प्रतियोगिता’ के नाम पर, कर्मचारियों के मनोरंजन के लिए निश्चित कर लिया जाता हॆ.प्रतियोगिता वाले दिन,अंधों में काणे राजा-यानि हिंदी में कुछ पढने-लिखने वाले कर्मचारियों को,नगद-पुरस्कार का लालच देकर,जबर्दस्ती हिंदी निबंध-लेखन व भाषण-प्रतियोगिता में बॆठाया जाता हॆ.कई बार तो पुरस्कार ज्यादा ऒर प्रतियोगी कम रह जाते हॆं.प्रतियोगिता खत्म होने के बाद,पुरस्कार-वितरण समारोह.कार्यालय अध्यक्ष अथवा कोई हिंदी-अधिकारी,मुस्कराने की कॊशिश करते हुए,पुरस्कार विजेताओं को नगद-पुरस्कार प्रदान करता हॆ.यदि विभाग की कोई पत्रिका हॆ तो उसके लिए फोटों भी तॆयार.कुछ कर्मचारी यह सोचकर,ताली बजाते हॆं कि पुरस्कार-विजेता को मिली राशी से, पार्टी के नाम पर, कुछ न कुछ तो वसूल कर ही लेंगें.समारोह के अंत में,अध्यक्ष महोदय-कर्मचारियों को हिंदी में काम करने का उपदेश देते हॆं.उसके बाद कुछ हल्का जल-पान ऒर फिर खेल खत्म! अगले दिन से फिर उसी पुराने ढर्रे पर.आजादी के इतने साल बाद भी-हर साल,वही नॊटंकी!क्या कभी वह दिन भी आयेगा,जब हम इस अंग्रेजी मानसिकता को उतार कर,आपस में अपनी ही भाषा में संवाद कर सकेगें?
***********************
28 अगस्त, 2010
अंग्रेज चले गये ?
अंग्रेज चले गये ? –विनोद पाराशर
’अंग्रेज चले गये’
’अब हम आजाद हॆं’
-दादाजी ने कहा
-पिता ने भी कहा
- मां ने समझाया
- भाई ने फटकारा
लेकिन वह-
चुप रहा।
दादाजी ने-
घर पर/ दिन-भर
अंग्रेजी का अखबार पढा।
पिता ने-
दफ्तर में/चपरासी को
अंग्रेजी में फटकारा।
मां ने-
स्कूल में/भारत का इतिहास
अंग्रेजी में पढाया।
भाई ने-
खादी-भंडार के
उदघाटन-समारोह में
विलायती सूट पहनकर
खादी का महत्व समझाया।
ऒर-
उसने कहा-’थूं’
सब बकवास हॆ।
’अब हम आजाद हॆं’
-दादाजी ने कहा
-पिता ने भी कहा
- मां ने समझाया
- भाई ने फटकारा
लेकिन वह-
चुप रहा।
दादाजी ने-
घर पर/ दिन-भर
अंग्रेजी का अखबार पढा।
पिता ने-
दफ्तर में/चपरासी को
अंग्रेजी में फटकारा।
मां ने-
स्कूल में/भारत का इतिहास
अंग्रेजी में पढाया।
भाई ने-
खादी-भंडार के
उदघाटन-समारोह में
विलायती सूट पहनकर
खादी का महत्व समझाया।
ऒर-
उसने कहा-’थूं’
सब बकवास हॆ।
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