नया घर

09 अक्टूबर, 2012

हिन्दी का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन ?


                                                             चित्र गूगल से साभार
 डा जगदीश्वर चतुर्वेदी, जाने माने मार्क्सवादी साहित्यकार और विचारक हैं.8 अक्टूबर,2012 को हस्तक्षेप में प्रकाशित-9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन पर पढिये उनका यह लेख
 नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन को समग्रता में देखें तो यह हिन्दी का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है। इससे हिन्दी सेवा कम हुई। नौकरशाही,कांग्रेस और संघ परिवार के कारिंदालेखकों -हिन्दीसैनिकों एवं सांसदों की मौजमस्ती ज्यादा हुई। कायदे से राजभाषा संसदीय समिति को इस सम्मेलन की गहराई में जाकर जांच करनी चाहिए और खोजी पत्रकारों को इस सम्मेलन की अंदरूनी अपव्यय गाथा को खोलना चाहिए।हिन्दी के नाम पर यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है........
                  पूरा लेख पढ़ने के लिए यहाँ पर क्लिक करें
              

06 मार्च, 2012

05 फ़रवरी, 2012

काले अंग्रेजों के मुंह पर,आशा भोंसले का तमाचा


अपना शहर:दिल्ली भी,काफी अजीब हॆ.यहां पर आये दिन,कोई न कोई तमाशा होता ही रहता हॆ.पिछले दिनों,2 फरवरी 2012 को एक संगीत समारोह के कार्यक्रम में,राष्ट्रभाषा,राजभाषा व जनभाषा ’हिंदी’ का जॆसा अपमान किया गया,वह न केवल निन्दनीय अपितु विचारणीय भी हॆ.प्राप्त जानकारी के अनुसार-इस कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध फिल्मी गीत गायिका आशा भोंसले व लोक-गायन में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त तीजन बाई ने दिल्लीवालों की गुलाम अंग्रेजी मानसिकता की, जिस तरह से खबर ली,वह शर्मसार करने वाली हॆ.
सूत्रों के अनुसार-हुआ यूं कि दोनों देवियाँ को'लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड' के कार्यक्रम में दिल्ली बुलाया गया था.|संगीत संबंधी यह कार्यक्रम पूरी तरह अंग्रेजी में चल रहा था.यह कोई अपवाद नहीं था. आजकल दिल्ली में कोई भी कार्यक्रम यदि किसी पांच-सितारा होटल या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर जैसी जगहों पर होता है तो वहां हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा के इस्तेमाल का प्रश्न ही नहीं उठता. इस कार्यक्रम में भी सभी वक्तागण एक के बाद एक अंग्रेजी झाड़ रहे थे. मंच संचालक भी अंग्रेजी बोल रहा था|
जब तीजनबाई के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा कि यहां का माहौल देखकर मैं तो डर गई हूं. आप लोग क्या-क्या बोलते रहे, मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा. मैं तो अंग्रेजी बिल्कुल भी नहीं जानती. तीजनबाई को सम्मानित करने के लिए बुलाया गया था लेकिन जो कुछ वहां हो रहा था, वह उनका अपमान ही था,लेकिन श्रोताओं में से कोई भी उठकर कुछ नहीं बोला. तीजनबाई के बोलने के बावजूद कार्यक्रम बड़ी बेशर्मी से अंग्रेजी में ही चलता रहा. इस पर आशा भोंसले झल्ला गईं. उन्होंने कहा कि मुझे पहली बार पता चला कि दिल्ली में सिर्फ अंग्रेजी बोली जाती है.लोग अपनी भाषाओं में बात करने में भी शर्म महसूस करते हैं. उन्होंने कहा मैं अभी लंदन से ही लौटी हूं. वहां लोग अंग्रेजी में बोले तो बात समझ में आती है लेकिन दिल्ली का यह माजरा देखकर मैं दंग हूं. उन्होंने श्रोताओं से फिर पूछा कि आप हिंदी नहीं बोलते, यह ठीक है लेकिन आशा है, मैं जो बोल रही हूं, उसे समझते तो होंगे? दिल्लीवालों पर इससे बड़ी लानत क्या मारी जा सकती थी?इसके बावजूद जब मंच-संचालक ने,बेशर्मी से अंग्रेजी में ही आशाजी से आग्रह किया कि वे कोई गीत सुनाएँ तो उन्होंने क्या करारा तमाचा जमाया? उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम कोका कोला कंपनी ने आयोजित किया है. आपकी ही कंपनी की कोक मैंने अभी-अभी पी है. मेरा गला खराब हो गया है. मैं गा नहीं सकती.
क्या हमारे देश के नकलची और गुलाम बुद्धिजीवी आशा भोंसले और तीजनबाई से कोई सबक लेंगे? ये वे लोग हैं, जो मौलिक है और प्रथम श्रेणी के हैं जबकि सड़ी-गली अंग्रेजी झाड़नेवाले हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों को पश्चिमी समाज नकलची और दोयम दर्जे का मानता है.वह उन्हें नोबेल और बुकर आदि पुरस्कार इसलिए भी दे देता है कि वे अपने-अपने देशों में अंग्रेजी के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के मुखर चौकीदार की भूमिका निभाते रहें. उनकी जड़ें अपनी जमीन में नीचे नहीं होतीं,ऊपर होती हैं. वे चमगादड़ों की तरह सिर के बल उल्टे लटके होते हैं.आशा भोंसले ने दिल्लीवालों के बहाने उन्हीं की खबर ली है.
हे तथाकथित प्रभु! यदि कहीं हो ऒर वाकई कुछ कर सकते हो, तो इन काले अंग्रेजों से इस देश को बचाओ, आम जनता आपका गुण-गान करेगी.

17 सितंबर, 2011

राजभाषा’हिंदी’ को भी चाहिए-एक’अन्ना हजारे?



सविंधान के अनुच्छेद 343 (1)के अनुसार संघ की राजभाषा’हिंदी’ ऒर लिपी देवनागरी हॆ.सविंधान में यह व्यवस्था 26,जनवरी 1950 को की गयी.-क्या यह सच हॆ? आप भी कहेंगें-कॆसा बेतुका सवाल हॆ? सविधान में यदि लिखा हॆ तो सच ही होगा.दर-असल यह पूर्ण सत्य नहीं हॆ.पूर्ण सत्य यह हॆ कि स्वतंत्रता के पूर्व राष्ट्रभाषा व जनभाषा ’हिंदी’ को राजभाषा बनाने का जो सोच-विचार कर निर्णय लिया गया था-स्वतंत्रता के बाद उसे, पूरी ईमानदारी से लागू नहीं किया गया.सत्ता-लॊलुप कुछ स्वार्थी तत्वों ने संविधान में ही ऎसी व्यवस्था कर दी कि ’हिंदी’ व्यवहार में कभी भी राजभाषा न बन सके.उसी सॆविंधानिक व्यवस्था के कारण,आज हम राजनॆतिक रुप से स्वतंत्र होते हुए भी,सांस्कृतिक व भाषागत स्तर पर अभी भी गुलाम हॆं फर्क सिर्फ इतना आया हॆ कि पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे,लेकिन अब अपनों की ही गुलामी करने के लिए विवश हॆं.कहने के लिए-हमारे देश में लोकतंत्र हॆ लेकिन इस मामले में तो लगता हॆ कि सत्ता पर काबिज कुछ स्वार्थी लोग,जनता को अपने ही तरीके से हाक रहे हें.
सबसे पहले बात-’राजभाषा’के संबंध में समय-समय पर किये गये कानूनी प्रावधानों की.14 सितंबर,1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद’हिंदी’को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया गया,जिसे 26,जनवरी,1950 से लागू कर दिया गया.सविधान के अनुच्छेद343 में ही साथ-साथ यह व्यवस्था भी कर दी गयी कि संविधान के लागू होने से पहले,सरकारी कार्यों में अंग्रेजी का प्रयोग जॆसे पहले होता था,उसी प्रकार अगले 15 वर्षों तक होता रहेगा..संविधान के अनुच्छेद 343(6)में यह व्यवस्था भी की गयी कि संसद को यह अधिकार होगा कि वह अधिनियम पारित करके 15 वर्ष के बाद अर्थात,26 जनवरी 1965 के बाद भी,सरकारी काम-काज में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रख सकती हॆ.इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद द्वारा राजभाषा अधिनियम 1963 पारित किया गया.जिसमें यह व्यवस्था की गयी कि हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का प्रयोग सभी सरकारी कार्यों ऒर संसद की कार्यवाही के लिए भी जारी रहेगा.जब इससे भी मन नहीं भरा तो अंग्रेजी के शुभचिंतकों ने राजभाषा (संशोधन)अधिनियम1967की धारा3(5)के रुप में एक उपबंध ऒर जुडवा दिया कि जब तक सभी राज्यों के विधानमंडल अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त करने के लिए संकल्य पारित न दें तथा उन संकल्पों पर विचार करने के उपरांत संसद के दोनों सदन इसी आशय का संकल्प पारित न कर दें-तब तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा.एक पुरानी कहावत हॆ कि ’न तो नॊ मन तेल होगा ऒर न ही राधा नाचेगी’ कहने का मतलब यह कि अपने-अपने राजनॆतिक स्वार्थों में फंसे नेतागण-न तो अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त करने का संकल्प पारित करेंगें ऒर न ही ’हिंदी’को राजभाषा का वास्तविक दर्जा मिलेगा.
सवाल सिर्फ ’हिंदी’ अथवा अंग्रेजी का नहीं हॆ.सवाल हॆ कि यदि हम वाकई एक स्वतंत्र देश के वासी हॆ, तो कब तक एक विदेशी भाषा का बोझ आपसी संवाद के लिए ढोते रहेंगें?क्या अंग्रेजी को राजभाषा के रुप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से मान्यता देकर-समाज के चंद मुट्ठी-भर लोग-आम लोगों को मानसिक रुप से गुलाम बनाने की साजिश नहीं रच रहे?.क्या इसे लोकतंत्र कहा जा सकता हॆ?
लोहिया जी ने ठीक कहा था-मेरी समझ में वे लोग बेवकूफ हॆं जो अंग्रेजी के चलते हुए समाजवाद कायम करना चाहते हॆं.वे लोग भी बेवकूफ हॆं जो समझते हॆं कि अंग्रेजी के रहते हुए जनतंत्र आ सकता हॆ.हम तो समझते हॆं कि अंग्रेजी के होते यहां ईमानदारी आना भी असंभव हॆ.-इन पंक्तियों में लोहिया जी ने बहुत ही गहरी बात कही थी-जो आज सार्थक हो रही हॆ.प्रशासन में ईमानदारी कहां हॆं? अधिकारी की भाषा अंग्रेजी हॆ तो आम आदमी की हिंदी या अन्य भारतीय भाषाएं.आम आदमी अपनी समस्या अपनी भाषा में लिखकर लेकर जाता हॆ लेकिन उसे जवाब उसकी भाषा में न मिलकर अंग्रेजी में मिलता हॆ.’हिंदी’पत्रों का जवाब हिंदी में देने की अनिवार्यता या तो राजभाषा नियमों में हॆ या फिर दीवार पर लिखकर टांगने के लिए.न तो इसकी परवाह पत्र का जवाब तॆयार करने वाले बाबू को हॆ ऒर न ही उसपर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी को.परवाह करें भी क्यों? इसके लिए कोई नियमों में सजा का प्रावधान तो हॆ नहीं.क्या यह भी एक तरह की प्रशासन में बेईमानी नहीं हॆ?यह भी एक तरह का भ्रष्टाचार ही हॆ.इन परिस्थितियों को देखते हुए क्या आपको नहीं लगता कि-आज राजभाषा’हिंदी’को भी एक अन्ना हजारे की जरुरत हॆ? 


15 सितंबर, 2011

हिंदी-दिवस पर श्री पी.चिदम्बरम-माननीय गृह-मंत्री का अंग्रेजी मोह





’हिंदी-दिवस’के उपलक्ष्य पर,14 सितंबर,2011 को,विज्ञान-भवन,नई दिल्ली में-भारत सरकार के’ राजभाषा विभाग’ की ओर से एक भव्य-समारोह का आयोजन किया गया.इस कार्यक्रम में-महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल व माननीय  गृह-मंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी ने संयुक्त रुप से’इन्दिरा गांधी राजभाषा’पुरस्कार व ’राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मॊलिक पुस्तक लेखन’पुरस्कारों का वितरण किया.इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण डी.डी.न्यूज,डी.डी.भारती तथा आकाशवाणी दिल्ली पर 11-30 बजे से किया गया.
राजभाषा विभाग की सचिव श्रीमती वीणा उपाध्याय ने अपने विभाग की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहा कि  राजभाषा के प्रचार-प्रसार हेतु जहां वित्तीय-वर्ष 2010-11में विभाग का योजनागत बजट 5.50 करोड रुपये था उसे वित्तीय-वर्ष 2011-12 में बढाकर 20 करोड रुपये कर दिया गया हॆ.इसी प्रकार वित्तीय-वर्ष 2010-11 में जहां 54 कम्पयूटर प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया,वहीं पर 2011-12 में 125 प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन का लक्ष्य रखा गया हॆ.इस अवसर पर हिंदी प्रयोक्ताओं के लिए विकसित सूचना प्रोद्यॊगिकी टूल्स का विवरण भी दिया गया.
माहमहिम प्रतिभा देवी पाटिल ने राजभाषा ’हिंदी’के महत्व पर बडे ही विस्तार से प्रकाश डाला व सभी से अनुरोध किया की सरकारी काम में अधिक से अधिक हिंदी का प्रयोग करें.इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण माननीय गृह-मंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी का भाषण रहा.उन्होंने अपने भाषण की शुरूआत अवश्य हिंदी से की लेकिन जल्दी ही अंग्रेजी पर आ गये.अंग्रेजी भाषा के प्रति उनका यह मॊह था या कॊई अन्य मजबूरी-यह तो माननीय मंत्री महोदय ही जानें.भाषण के अंत तक पहुंचते-पहुंचते शायद उन्हें याद आ गया कि अरे!-यह तो ’हिंदी-दिवस’ हॆ.इसलिए उन्होंने अपने भाषण का अंत हिंदी में ही किया.इस कार्यक्रम की लाईव वेबकास्टिंग निम्नलिखित-वेबसाईडों पर उपलब्ध हॆ:
www.rajbhasha.gov.in
www.rajbhasha.nic.in
www.webcast.gov.in