नया घर

15 सितंबर, 2011

हिंदी-दिवस पर श्री पी.चिदम्बरम-माननीय गृह-मंत्री का अंग्रेजी मोह





’हिंदी-दिवस’के उपलक्ष्य पर,14 सितंबर,2011 को,विज्ञान-भवन,नई दिल्ली में-भारत सरकार के’ राजभाषा विभाग’ की ओर से एक भव्य-समारोह का आयोजन किया गया.इस कार्यक्रम में-महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल व माननीय  गृह-मंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी ने संयुक्त रुप से’इन्दिरा गांधी राजभाषा’पुरस्कार व ’राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मॊलिक पुस्तक लेखन’पुरस्कारों का वितरण किया.इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण डी.डी.न्यूज,डी.डी.भारती तथा आकाशवाणी दिल्ली पर 11-30 बजे से किया गया.
राजभाषा विभाग की सचिव श्रीमती वीणा उपाध्याय ने अपने विभाग की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहा कि  राजभाषा के प्रचार-प्रसार हेतु जहां वित्तीय-वर्ष 2010-11में विभाग का योजनागत बजट 5.50 करोड रुपये था उसे वित्तीय-वर्ष 2011-12 में बढाकर 20 करोड रुपये कर दिया गया हॆ.इसी प्रकार वित्तीय-वर्ष 2010-11 में जहां 54 कम्पयूटर प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया,वहीं पर 2011-12 में 125 प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन का लक्ष्य रखा गया हॆ.इस अवसर पर हिंदी प्रयोक्ताओं के लिए विकसित सूचना प्रोद्यॊगिकी टूल्स का विवरण भी दिया गया.
माहमहिम प्रतिभा देवी पाटिल ने राजभाषा ’हिंदी’के महत्व पर बडे ही विस्तार से प्रकाश डाला व सभी से अनुरोध किया की सरकारी काम में अधिक से अधिक हिंदी का प्रयोग करें.इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण माननीय गृह-मंत्री श्री पी.चिदम्बरम जी का भाषण रहा.उन्होंने अपने भाषण की शुरूआत अवश्य हिंदी से की लेकिन जल्दी ही अंग्रेजी पर आ गये.अंग्रेजी भाषा के प्रति उनका यह मॊह था या कॊई अन्य मजबूरी-यह तो माननीय मंत्री महोदय ही जानें.भाषण के अंत तक पहुंचते-पहुंचते शायद उन्हें याद आ गया कि अरे!-यह तो ’हिंदी-दिवस’ हॆ.इसलिए उन्होंने अपने भाषण का अंत हिंदी में ही किया.इस कार्यक्रम की लाईव वेबकास्टिंग निम्नलिखित-वेबसाईडों पर उपलब्ध हॆ:
www.rajbhasha.gov.in
www.rajbhasha.nic.in
www.webcast.gov.in

14 सितंबर, 2011

’हिंदी’ के लिए-’हल-चल’



हर साल सितंबर का महिना शुरु होते ही-सरकारी-विभागोंमें राजभाषा हिंदीके लिए हल-चल शुरु हो जाती हॆ.जो विभाग वाकई सारे साल हिंदी में अधिकतर काम करते हॆं-उन्हें हिंदी-दिवसया हिंदीपखवाडाआने पर चिंता नहीं होती,लेकिन जो सारे साल अंग्रेजी का गुण-गाण ऒर उसकी सेवा में लगे रहते हॆं,उनके लिए सितंबर का महिना थोडा तनावपूर्ण जरुर हो जाता हॆ.सरकारी त्यॊहार हॆ,लोक-लाज बचाने के लिए कुछ तो करना ही पडेगा.हिंदी-पखवाडेका बॆनर टांगना पडेगा.प्रतियोगितायें आयोजित करनी पडेंगीं.प्रतियोगिता हेतु ,डरा-धमका-कर या मिलने वाले पुरस्कार की गारंटी देकर प्रतियोगी इकट्ठे करने पडेंगें.आफिस का खोटा सिक्का(हिंदी में काम करने वाला कर्मचारी) इन दिनों बडा काम आयेगा.अंग्रेजी में चिट्ठी न लिख पाने के कारण साल-भर, अफसर से डांट खाने वाला-रामू’-इन दिनों रामलाल जीहो जायेगा.कोई बात नहीं! एक महिने का ही तो कष्ट हॆ-झेल लेंगें बेचारें! उसके बाद,बाकी के ग्यारह महीने -मॊजा ही मॊजा’.
सरकारी विभाग को राज-भाषाहिंदीकी चिंता हुई-तो थोडी खल-बली मिडियामें भी होनी ही थी.इलॆक्ट्रानिक मिडिया में तो अभी हल-चल इतनी नहीं हॆ,जितनी प्रिंट-मिडिया में हॆ.दॆनिक अखबारों,पत्र-पत्रिकाओं ने इन दिनों
हिंदीको विशेष रुप से कवर करना शुरु कर दिया हॆ.चलो! इस हल-चल से शायद ’हिंदी’ का कुछ भला हो जाये-इसी उम्मीद से-हमने निर्णय किया हॆ कि इस महीने,हम भी अपनी आंखे खुली रखेंगें ऒर अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिन प्रति दिन ’हिंदी’से संबंधित हल-चलों की खबर आपको देते रहेंगें. अभिव्यक्ति का नया माध्यम या कहे
लोकतंत्र का पांचवां-स्तंभ-यानी ब्लागिंग भी राजभाषा’हिंदी’ को लेकर चिंतिंत हॆ.हमारे ब्लागर साथी भी इस विषय पर अपने विचार-कविता,लेख,
कहानी इत्यादि के माध्यम से व्यक्त कर रहे हॆं.हमारी कॊशिश होगी इस विषय से संबंधित उनकी रचनाओं से आपको भी अवगत करवाया जाये.हम यहां स्पष्ट कर दें कि जो भी सामग्री इस ब्लाग पर प्रकाशित होगी-यह जरुरी नहीं कि उससे हमारी सहमति ही हो.हमारा मकसद विषय से संबंधित सामग्री को एक मंच प्रदान करना हॆ.आशा हॆ सभी ब्लागर-साथी,इस मंच के योगदानकर्ता व अनुसरणकर्ता-इस काम में हमारा सहयोग देंगें.
     ’हिंदी-दिवस’ की शुभकामनाओं के साथ,
आपका साथी-
-विनोद पाराशर-


12 जून, 2011

राजभाषा संसदीय़ उपसमिति का निरीक्षण दॊरा








4 जून,2011 को,राजभाषा संसदीय उपसमिति के सद्स्यों ने दिल्ली के तीन सरकारी कार्यालयों में,राजभाषा हिंदी की स्थिति का निरीक्षण किया.इन सरकारी कार्यालयों में उत्तरी रेलवे,भारतीय डाक विभाग व नेशनल सीड कारपोरेशन का एक-एक कार्यालय शामिल था.पूरे साल तक अंग्रेजी का राग अलापने वाले अधिकारियों ने,निरीक्षण के दॊरान-हिंदी को संजाने-संवारने में कोई कसर नहीं छोडी.संसदीय उपसमिति के सदस्यों में माननीय  सांसद  डा.सत्यव्रत चतुर्वेदी व कई अन्य सांसद शामिल थे.तीनॊं सरकारी विभागों के, आला अधिकारी इस अवसर पर मॊजूद थे.कई सप्ताह से निरीक्षण की तॆयारी में जुटे अधिकारियों ने,निरीक्षण के उपरांत राहत की सांस ली.आप भी देखिये इस कार्यक्रम की कुछ झलकियां:-

23 जनवरी, 2011

राजभाषा हिंदी के समुचित प्रचार-प्रसार में-ब्लाग लेखन पर संगोष्ठी




हिन्दी का प्रयोग न करने को देश में क्राइम घोषित कर दिया जाना चाहिए
पवन *चंदन* ON SATURDAY, JANUARY 22, 2011 |

नयी दिल्ली/ हिन्‍दी का प्रयोग न करने को देश में क्राइम घोषित कर दिया जाना चाहिए और आज मैं इस मंच से पूरा एक दशक हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के नाम करने की घोषणा करता हूं। इस एक दशक में आप देखेंगे कि हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सबसे शक्तिशाली विधा बन गई है। जिस प्रकार मोबाइल फोन सभी तकनीक से युक्‍त हो गया है, उसी प्रकार हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सभी प्रकार के संचार का वाहक बन जाएगी। प्रख्‍यात व्‍यंग्‍यकार और चर्चित ब्‍लॉग नुक्‍कड़ के मॉडरेटर अविनाश वाचस्‍पति ने जब यह आवाह्न किया तो पूरा सभागार तालियों की करतल ध्‍वनि से गूंज उठा।उन्‍होंने कहा कि मीडियाकर्मियों और हिन्‍दी ब्‍लागरों का समन्‍वयन अवश्‍य ही इस क्षेत्र में सकारात्‍मक क्रांति का वाहक बनेगा। जिस प्रकार हिन्‍दी ब्‍लॉगर और मीडियाकर्मी एकसाथ मिले हैं, उसी प्रकार यह परचम सभी क्षेत्रों में लहराना चाहिये। प्रत्‍येक क्षेत्र में से हिन्‍दी ब्‍लॉगर बनें और अपने अपने क्षेत्र की उपलब्धियों को सामने लायें। हिंदी मन की भाषा है और इस भाषा की जो शक्ति है वो हिन्‍दी के राष्‍ट्रभाषा न बनने से भी कम होने वाली नहीं है। वे राजधानी के आदर्श नगर में आयोजित हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की कार्यशाला और ब्‍लॉगर सम्‍मेलन के मौके पर उपस्थित समुदाय को संबोधित कर रहे थे।
आई बी एन सेवन के अनिल अत्री ने कहा कि हिंदी भाषा सम्पूर्ण राष्ट्र को जोड़ने की क्षमता रखती है..विश्व मंच पर राष्ट्र का गौरव भाषा बन सकती है..हिंदी खुद में एक संस्‍कृति और संस्कार है..दिल से बोली जाने और दिल से सुनी जाने वाली इस भाषा को पढ़ने और लिखने वालों की संख्या देशभर में कम नहीं है।
इस कार्यशाला की उपलब्धि उत्‍तराखंड खटीमा से पधारे डॉ. रूपचन्‍द्र शास्‍त्री ‘मयंक’ और चित्‍तौड़गढ़ से पधारी इंदुपुरी गोस्‍वामी रहीं। दिल्ली में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से भी भारी संख्या में पत्रकारों ने शिरकत कर वेब पत्रकारिता के गुर भी सीखे और यह अनुभव किया कि आज हिंदी किस मुकाम पर है और इसे शिखर पर पहुंचाया जा सकता है। इस कार्य शाला में शिरकत कर रहे मीडियाकर्मियों ने अपने अपने ब्‍लॉग बनाये और संकल्प किया कि वे भी अब नियमित रूप से ब्लॉग लिखा करेंगे।
उपस्थित लोगों में उल्‍लेखनीय चर्चित ब्‍लॉगर अजय कुमार झा, पवन चंदन, सुरेश यादव, पाखी पत्रिका की उप संपादक प्रतिभा कुशवाहा, संगीता स्‍वरूप, वंदना गुप्‍ता, शिशिर शुक्‍ला, राजीव तनेजा, शोभना वेलफेयर सोसायटी के सुमित तोमर, विनोद पाराशर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में पी एच डी कर रहे केवल राम, अनिल अत्री,इत्‍यादि के नाम उल्‍लेखनीय हैं। मीडियाकर्मियों में इंडियान्‍यूज के वी के शर्मा, सहारा टी वी के रजनीकांत तिवारी, आज तक के आनंद कुमार, सतीश शर्मा ,संजय राय , राजेश खत्री , योगेश खत्री , हर्षित , दीपक शरमा , राजेंदर स्वामी ने अपने अपने ब्‍लाग बनाये।
ब्‍लॉग लिखने की तकनीकी जानकारी पद्मावली ब्‍लॉग के पद्म सिंह, ब्‍लॉगप्रहरी के कनिष्‍क कश्‍यप और अविनाश वाचस्‍पति ने सामूहिक रूप से दी। इस कार्यशाला का आयोजन और संचालन अनिल अत्री ने किया। आदर्श नगर में करीब सुबह 11 बजे से शुरू हुई हिन्‍दी ब्‍लॉगिग की यह कार्यशाला शाम 5 बजे तक निरंतर चलती रही. इस कार्यशाला में देश के कई नामी साहित्‍यकार लेखक और दिल्ली के हिंदी पत्रकारों ने भाग लिया.
प्रस्‍तुति : नुक्‍कड़ संपादकीय टीम।


संगोष्ठी के कुछ अन्य छाया चित्र

23 सितंबर, 2010

हिन्दी पखवाडा-विनोद पाराशर


साहब ने-
चपरासी को
हिन्दी में फटकारा
’हिन्दी-स्टॆनों’ को
पुचकारा
ऒर-कलर्क को
अंग्रेजी टिप्पणी के लिए
लताडा.
क्या करें ?
मजबूरी हॆ-
वो आजकल मना रहे हॆं
हिंदी पखवाडा.
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14 सितंबर, 2010

हिंदी दिवस:कुछ जरुरी सवाल(?)

सन् 1949 में, 14 सितम्बर को भारत के संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। तब से प्रत्येक वर्ष,केन्द्र सरकार के सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी दिवस मनाया जाता हॆ. आज आप भी मना रहे हॆं.किसी किसी कार्यालय में तो ’हिंदी दिवस’उस कार्यालय की ’हिंदी’वाली फाईल में ही मन जाता हॆ.साथ वाले कर्मचारी तक को भी पता नहीं लग पाता कि आज ’हिंदी-दिवस’ हॆ.यदि कोई कार्यालय ज्यादा ही सक्रिय हुआ तो थोडी देर के लिए सभी कर्मचारियों को एकत्रित किया,रुखे से मन से, मंत्री महोदय अथवा विभागाध्यक्ष की, हिंदी में काम करने की अपील पढी,आगे से कर्मचारियों को हिंदी में काम करने की शपथ दिलवाई-बस! मन गया हिंदी दिवस.हर साल हिंदी में काम करने की कसम खाते हॆं ऒर उसी दिन तोड भी देते हॆं.यही सिलसिला पिछले 60 साल से लगातार चल रहा हॆ.शायद आगे भी चलेगा.
क्या हमने कभी इस विषय में गंभीरता से सोचा हॆ कि –भारत सरकार की राज-भाषा नीति के अनुसार- अपना सरकारी काम-काज’हिंदी’ में ही क्यों करना चाहिए ? अंग्रेजी में क्यों नही? हिंदी में करो या अंगेजी में क्या फर्क पडता हॆ? ऎसे बहुत से सवाल हॆ जो अक्सर पूछे जाते हॆं.लेकिन इन सवालों पर कभी गंभीरता से चर्चा नहीं की जाती हॆ.हिंदी-दिवस एक ऎसा अवसर हॆ,जब इन मुद्दों पर खुले मन से,चर्चा की जानी चाहिए.
पहला सवाल-सरकारी कर्मचारियों को अपना सरकारी काम-काज हिंदी में क्यों करना चाहिए?
हमारे देश भारत में,तानाशाही नहीं,लोकतात्रिक शासन व्यवस्था हॆ.देश का शासन जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता हॆ.सरकारी काम करने व करवाने के क्या नियम, होंगें-इसका निर्धारण करना-हम सरकारी कर्मियों का काम नहीं,उन जन-प्रतिनिधियों का हॆ,जिन्हें जनता ने चुनकर भेजा हॆ.सरकारी कर्मचारी हमें किसी ने जबर्दस्ती नहीं बनाया.हमने यह सरकारी नॊकरी स्वयं स्वीकार की हॆ.नियुक्ति के समय हम सभी ने शपथ ली हॆ कि सरकार द्वारा समय-समय पर बनाये गये नियमों का पालन करेंगें.सरकार हमसे जो काम करवाती हॆ-उसके बदले हमें वेतन देती हॆ-जिससे हमारे परिवार का गुजारा चलता हॆ.हम एक अच्छा सभ्य जीवन जीते हॆं.’हिंदी’को राजभाषा का सॆविधानिक दर्जा मिले-60 वर्ष बीत चुके हॆं.लेकिन सरकारी काम-काज में,अभी तक हमने इसे कितना अपनाया हॆ? यह बात किसी से छिपी नहीं हॆ.जिस अंग्रेजी को सहयोगी भाषा के रुप में,कुछ वर्षों के लिए अपनाने की छूट दी गयी थी-वही वास्तव में राजभाषा के सिहासन पर जमी बॆठी हॆ.राजभाषा’हिंदी’ को लागू करने के संबंध में सरकार की नीति अभी तक सहयोग व प्रोत्साहन की रही हॆ.कोई जोर-जबर्दस्ती का रवॆया अभी तक नहीं अपनाया हॆ.शायद सरकार की इसी नीति का फायदा उठाकर,कुछ अंग्रेजीपरस्त अधिकारी ऒर कर्मचारी ’हिंदी’में काम करने का प्रयास ही नहीं करते-जबकि सरकार की तरफ से हर प्रकार का सहयोग उन्हें दिया जा रहा हॆ.रामचरित्र मानस में तुलसीदासजी ने लिखा हॆ-’भय बिन होय न प्रीति’अर्थात भय दिखाये बिना तो प्रेम भी नहीं होता.क्या हम उसी दिन का इंतजार कर रहे हॆं-जब सरकार राजभाषा नियमों की अवहेलना करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान करेगी?क्या हमारा यह नॆतिक दायित्व नहीं बनता कि जनता का काम,उस जनता की भाषा में करें-जिसे देश की 90% से अधिक आबादी आसानी से समझती हॆ?थोडी सी अपनी कार्य करने की सुविधा ऒर एक विदेशी भाषा के प्रति अनावश्यक मोह के लिए-लोकतांत्रिक व्यवस्था में-अधिकांश जनता को,उसके अधिकारों से वंचित कर देना-कहां तक उचित हॆ? जरा सोचकर तो देखिये.
दूसरा सवाल:सरकारी काम-काज अंग्रेजी में ही क्यों नहीं?
अंग्रेजी ही नहीं,विश्व की कोई भी भाषा बुरी नहीं हॆ.भाषा तो विचारों को एक-दूसरे तक प्रेषित करने का माध्यम मात्र हॆ.अपनी जानकारी बढाने के लिए,सामर्थ्य के अनुसार-हमें भारतीय ही नहीं,विश्व की ज्यादा से ज्यादा भाषा सीखनी चाहिए.इसमें कोई दो राय नहीं कि अंग्रेजी ने अपनी कर्मठता के बल पर,विश्व में अपना परचम लहराया हॆ.लेकिन स्वतंत्रता के 63 साल बाद भी,एक विदेशी भाषा का राजभाषा के रुप में कब्जा जमाये रखना-किसी भी नजरिये से उचित नहीं ठहराया जा सकता.सारे कानूनी प्रावधान होते हुए-कुछ लोगों की जिद्द के कारण ,बडी आबादी को उनके अधिकारों से वंचित रखना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं हॆ.सभी भारतीय भाषाओं के मध्य अंग्रेजी दीवर बनकर खडी हुई हॆ,वह हम भारतीयों को अपनी भाषा में संवाद करने ही नहीं देती.अंग्रेजी को विदेशों से सम्पर्क भाषा के रुप में मान्यता दी जा सकती हॆ,लेकिन हम भारतीयों के आपसी संवाद के लिए कोई स्वदेशी भाषा ही होनी चाहिए.इसके लिए हिंदी के अलावा ऒर कॊन-सी सर्व-सुलभ भारतीय भाषा हॆ जिसे राजभाषा का दर्जा दिया जा सके?
इसके अलावा भी-बहुत से सवाल हॆं जॆसे-सभी सरकारी कामों में हिंदी सबसे निचले पायदान पर क्यों हॆ?क्या कार्यालय में राजभाषा हिंदी में काम करना,सरकारी काम नहीं हॆ?......य़दि आप, हिंदी दिवस के अवसर पर,बिना किसी पूर्वा-ग्रह के,इन सवालों पर विचार-मंथन के लिए तॆयार हॆं,तो मेरी शुभकामनायें आपके साथ हॆं.
जय हिंद!